संविधान से धोखा है धर्म परिवर्तन कर आरक्षण का लाभ
Changing religion and getting reservation is a betrayal of the constitution
सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा है कि बिना किसी वास्तविक आस्था के केवल आरक्षण के लाभ हेतु किया गया धर्म परिवर्तन संविधान के साथ धोखाधड़ी है।
न्यायमूर्ती पंकज मिथल और न्यायमूर्ति आर महादेवन ने सी सेल्वरानी की याचिका पर 26 नबंवर 2024 को यह फैसला सुनाते हुए, मद्रास उच्च न्यायालय के 24 नबंवर के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें ईसाई धर्म अपना चुकी एक महिला को अनुसूचित जाति प्रमाण-पत्र देने से इंकार कर दिया था। महिला ने बाद में आरक्षण के तहत रोजगार का लाभ प्राप्त करने के लिए हिंदू होने का दावा किया था।
लेकिन इस पीठ ने 21 पृष्ठीय फैसले में साफ किया कि कोई व्यक्ति किसी अन्य धर्म को तभी अपनाता है, ज बवह वास्तव में उसके सिद्धांतों और धर्म आधारित आध्यात्मिक विचारों से प्रेरित होता है।
यदि धर्म परिवर्तन का मकसद दूसरे धर्म में वास्तविक आस्था होने की बजाय आरक्षण का लाभ प्राप्त करना है तो इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती, क्योंकि ऐसी गलत इच्छा रखने वाले लोगों को आरक्षण का लाभ देने से आरक्षण नीति के सामाजिक व्यवहार को क्षति पहुंचेगी।
बावजूद सेल्वरानी हिंदू होने का दावा करती है और नौकरी के लिए अनुसूचित जाति का प्रमाण-पत्र मांगती है, तब यह दोहरा दावा अस्वीकार्य है। साफ है, वह ईसाई धर्म अपनाने के बावजूद एक हिंदू के रूप में अपनी पहचान नहीं बनाए रख सकती हैं।
संविधान के तीसरे अनुच्छेद, अनुसूचित जाति आदेश 1950 जिसे प्रेसिडेंशियल ऑर्डर के नाम से भी जाना जाता है, के अनुसार केवल हिंदू धर्म का पालन करने वालों के अतिरिक्त किसी अन्य व्यक्ति को अनुसूचित जाति की श्रेणी में नहीं माना जाएगा। इसी तारतम्य में पिछले पचास सालों से दलित ईसाई और दलित मुसलमान संघर्षरत रहते हुए हिंदू अनुसूचित जातियों को दिए जाने वाले अधिकारों की मांग करते चले आ रहे हैं। वर्तमान में मुसलमान, सिख, पारसी, ईसाई और बौद्ध ही अल्पसंख्यक दायरे में आते हैं। जबकि जैन, बहाई और कुछ दूसरे धर्म-समुदाय भी अल्पसंख्यक दर्जा हासिल करना चाहते हैं। लेकिन जैन समुदाय केन्द्र द्वारा अधिसूचित सूची में नहीं है। इसमें भाषाई अल्पसंख्यकों को अधिसूचित किया गया है, धार्मिक अल्पसंख्यकों को नहीं। सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के मुताबिक जैन समुदाय को भी अल्पसंख्यक माना गया है। परंतु इन्हें अधिसूचित करने का अधिकार राज्यों को है, केंद्र को नहीं। इन्हीं वजहों से आतंकवाद के चलते अपनी ही पुश्तैनी जमीन से बेदखल कश्मीरी पंडित अल्पसंख्यक के दायरे में नहीं आ पा रहे हैं। मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह की कांग्रेस सरकार के दौरान जैन धर्मावलंबियों को भी अल्पसंख्यक दर्जा दिया था, लेकिन अल्पसंख्यकों को दी जाने वाली सुविधाओं से ये आज भी वंचित हैं।
संविधान के अनुच्छेद-342 में धर्म परिवर्तन के संबंध में अनुच्छेद-341 जैसे प्रावधान में लोच है। 341 में स्पष्ट है कि अनुसूचित जाति के लोग धर्म परिवर्तन करेंगे तो उनका आरक्षण समाप्त हो जाएगा। इस कारण यह वर्ग धर्मांतरण से बचा हुआ है। जबकि 342 के अंतर्गत संविधान निर्माताओं ने जनजातियों के आदि मत और पुरखों की पारंपरिक सांस्कृतिक आस्था को बनाए रखने के लिए व्यवस्था की थी कि अनुसूचित जनजातियों को राज्यवार अधिसूचित किया जाएगा। यह आदेश राष्ट्रपति द्वारा राज्य की अनुशंसा पर दिया जाता है। इस आदेश के लागू होने पर उल्लेखित अनुसूचित जनजातियों के लिए संविधान सम्मत आरक्षण के अधिकार प्राप्त होते हैं। इस आदेश के लागू होने के उपरांत भी इसमें संशोधन का अधिकार संसद को प्राप्त है। इसी परिप्रेक्ष्य में 1956 में एक संशोधन विधेयक द्वारा अनुसूचित जनजातियों में धर्मांतरण पर प्रतिबंध के लिए प्रावधान किया गया था कि यदि इस जाति का कोई व्यक्ति ईसाई या मुस्लिम धर्म स्वीकार्यता है तो उसे आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा। किंतु यह विधेयक पारित नहीं हो पाया है। अनुच्छेद 341 के अनुसार अनुसूचित जातियों के वही लोग आरक्षण के दायरे में हैं, जो भारतीय धर्म हिन्दू, बौद्ध और सिख अपनाने वाले हैं। गोया, अनुच्छेद-342 में 341 जैसे प्रावधान हो जाते हैं, तो अनुसूचित जनजातियों में धर्मांतरण की समस्या पर स्वाभाविक रूप से अंकुश लग जाएगा।
राज्यसभा में भाजपा सांसद जीवीएल नरसिम्हा राव द्वारा पुछे गए एक सवाल के जबाव में पूर्व विधि मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा था कि ‘अनुसूचित जाति एवं जनजाति के जिन लोगों ने इस्लाम या ईसाई धर्म अपना लिया है, वे आरक्षण के लाभ का दावा नहीं कर सकते हैं। यही नहीं ये लोग सरकारी नौकरियों के साथ-साथ संसद और विधानसभा के लिए आरक्षित सीटों पर भी चुनाव लड़ने के योग्य नहीं माने जाएंगे। केवल हिन्दू, सिख और बौद्ध मत को मानने वाले लोग ही अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट से चुनाव लड़ने की पात्रता रखेंगे। इन्हीं लोगों को सरकारी नौकरियों की पात्रता रहेगी।‘ उन्होंने आगे यह भी स्पष्ट किया था कि ‘इस्लाम और ईसाई धर्म अपना चुके अनुसूचित जाति एवं जनजाति के सदस्यों को संसद या विधानसभा चुनाव लड़ने से रोकने के लिए जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम में भी संशोधन की कोई जरूरत नहीं है। क्योंकि हिंदुत्व को मानने वाले और इस्लाम या ईसाई धर्म अपना चुके लोगों के बीच अधिनियम में पहले से ही स्पष्ट विभाजन रेखांकित है।‘ इस बयान से साफ हुआ था कि इस्लाम और ईसाई धर्म अपनाने वाले दलित और बृहद हिंदू धर्म के तहत आने वाले दलितों के बीच अंतर साफ है। यदि कालांतर में कार्यपालिका और विधायिका में बिना किसी बाधा के इस बयान पर अमल की प्रक्रिया शुरू हो जाती है तो हिंदुओं में धर्म परिवर्तन थमने का सिलसिला शुरू हो जाता और इससे राष्ट्रवाद को मजबूती मिलती। क्योंकि ज्यादातर ईसाई व इस्लामिक संस्थाओं को शिक्षा और स्वास्थ्य के बहाने हिंदुत्व और भारतीय राष्ट्रवाद की जड़ों में मट्ठा घोलने के लिए विदेशी धन मिलता है।
2006 में केंद्र में जब संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार थी, तब संविधान में 93वां संशोधन कर अनुच्छेद-15 में नया खंड-5 जोड़कर स्पष्ट किया गया था कि सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों के लिए शैक्षणिक संस्थाओं में प्रवेश के लिए विशेष प्रावधान किए जा सकेंगे। लेकिन ये प्रावधान अल्पसंख्यक संस्थाओं को छोड़कर सभी निजी संस्थाओं पर लागू होंगे। चाहे उन्हें सरकारी अनुदान प्राप्त होता हो। यह प्रावधान अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को अनुच्छेद-15 के खंड 3 व 4 के क्रम में ही किया गया था। इससे भी साफ होता है कि इन जातियों के जो लोग ईसाई या इस्लामिक संस्थाओं अर्थात अल्पसंख्यक संस्थाओं में धर्म परिवर्तित कर शिक्षा लेते हैं, उन्हें अनुदान की पात्रता नहीं होगी। साफ है, अब तक धर्म परिवर्तन कर अनुसूचित जातियों के अधिकार को छीनकर हकमारी कर रहे लोगों को वास्तव में आरक्षण के लाभ की पात्रता नहीं है। अतएव अनुसूचित जातियों के परिप्रेक्ष्य में न्यायालय के इस फैसले ने साफ कर दिया है कि ईसाई या इस्लाम धर्मावलंबी बने अनुसूचित जाति के लोग केवल नौकरी के लिए फिर से धर्म परिवर्तन कर हिंदू नहीं बन सकते है। यह उपाय आरक्षण के मूल उद्देष्य के विरुद्ध होने के साथ संविधान के साथ धोखाधड़ी है। यह उपाय आरक्षण नीति के मौलिक समाजिक लक्ष्यों को कमजोर करता है। अतएव ऐसे उपाय हाषिए पर पड़े समुदायों के उत्थान के उद्देष्य के तहत आरक्षण नीतियों की मूल भावना के विपरीत हैं।






