योगी और अखिलेश में यही फर्क है
This is the difference between Yogi and Akhilesh
देश में कुछ राजनीतिक दलों का एक ही काम है, मुसलमानों का तुष्टिकरण, किसी भी हद तक जाकर और उसे जायज ठहराकर दूसरों को सवालों के घेरे में ख़ड़ा करना। यूपी की सपा ऐसी ही पार्टी है। वह बात जरूर पीडीए यानी पिछड़ा,दलित व अल्पसंख्यक की करती है लेकिन उसे इनमें सबसे ज्यादा चिंता अल्पसंख्यक यानी मुसलमान की रहती है।मुसलमान गलत भी करें तो वह उसके साथ यह कहते हुए खड़ी रहती है, वह तो ऐसा करना नहीं चाहते थे, उनको तो ऐसा करने के लिए मजबूर कर दिया गया। वह कभी नहीं कहती है मुसलमानों ने कभी कुछ गलत किया है। सपा की कोशिश तो यही साबित करने की रहती है कि मुसलमानों के साथ गलत हो रहा है, इसलिए वह जो कुछ करते हैं मजबूरी में करते हैं।
यूपी के संभल मामले में भी सपा मुसलमानों के साथ खड़ी हुई है।उसने पत्थरबाजी की कोई आलोचना नहीं की है।संभल में कोर्ट एक मस्जिद के सर्वे का आदेश दिया तो टीम सर्वे करने गई। टीम अपनी तरफ से तो जबरन मुसलमानों के विरोध के बाद भी सर्वे करने नहीं गई थी। सर्वे कोर्ट का आदेश था। सर्वे के विरोध में पथराव का मतलब तो यही होता है कि हम किसी कोर्ट के आदेश के नहीं मानते। हम तो कोर्ट के आदेश का भी विरोध करेंगे, पथराव करेंगे, तमंचे चलाएंगे, पुलिस पर हमला करेंगे।यह तो कानून को अपने हाथ में लेना हुआ। यह तो कानून का पालन करना नहीं हुई। लोकतंत्र में कानून का राज होता है, जिसे भी लोकतंत्र में रहना है, उसे कानून के राज को मानना पड़ेगा। जो लोग ऐसे नहीं करते हैं। वह लोकतंत्र में रहने लायक नहीं है। वह किसी तंत्र में रहने लायक नहीं होते हैं।
संभल मारे गए लोग जरूर पत्थरबाजी कर रही भीड़ में शामिल रहे होंगे। ऐसी हिंसा में मारे गए लोगों के साथ किसी की सहानुभूति नहीं होती है, सब मानकर चलते हैं कि वह जरूर गलत कर रहा होगा या गलतकर रहे लोगों की भीड़ में रहा होगा।इसलिए मारा गया। ऐसे लोगों को सपा पांच लाख रुपए का मुआवजा देने की घोषणा करती है और सरकार से मांग करती है कि वह संभल में मारे गए लोगों को एक करोड़ का मुआवजा दे।यह हद दर्जे का तुष्टिकरण है। ऐसा करते हुए सपा के नेता सोच नहीं रहे हैं कि वह कर क्या रहे हैं, क्या इस तरह मारे गए लोगों को मुआवजा मिलने से पत्थरबाजी रुकेगी, हिंसा रुकेगी । इससे तो पत्थरबाजी करने वालों, हिंसा करने वालों को बढ़ावा मिलेगा कि कौम के लिए लड़ते हुए मारे जाएंगे तो कोई पैसा दे न दे सपा तो जरूर पांच लाख का मुआवजा देगी।
ऐसा करके सपा ने खुद अपने लिए भी मुसीबत मोल ले ही है। क्योंकि यूपी में ऐसी घटनाएं तो होती रहती हैं, संभल में तो पांच लोग ही मारे गए है, इसलिए सपा को पच्चीस लाख देना महंगा नहीं लगेगा लेकिन कहीं अगर ज्यादा लोग मारे जाते हैं तो सपा के लिए पांच पांच लाख देना महंगा पड़ेगा। तब सपा को लगेगा कि संभल में उसने पांच पांच लाख का मुआवजा देने की घोषणा कर गलत किया था।यूपी में योगी आदित्यनाथ की सरकार है वह दंगाइयों को मुआवजा देने में यकीन नहीं रखती है, वह तो दंगाइयों से दंगा के दौरान हुए नुकसान की भरपाई करने में यकीन रखती है ताकि अगली बार कोई राज्य में सरकारी या निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाए तो नुकसान पहुंचाने के पहले सोचेगा कि नुकसान की भरपाई उसे या घरवालों को करनी पड़ेगी।
योगी और अखिलेश में यही फर्क है कि योगी दंगाइयों से नुकसान की भरपाई कर उनको दंगा करने से रोकने का प्रयास करते है, जबकि अखिलेश यादव दंगाइयों के साथ खड़े होकर दंगाइयों को फिर से य़ूपी में कहीं दंगा करने के लिए उकसाते हैं। पिछला चुनाव यूपी में सपा इसीलिए हारी है कि वह तुष्टिकरण की राजनीति कर रही है और योगी हिंदुत्व के साथ विकास की राजनीति कर रहे हैं। जनता योगी की राजनीति को पसंद कर रही है और अखिलेश यादव की राजनीति को पसंद नहीं कर रही है। यही वजह है नौ में सात सीटें एनडीए जीतती है और सपा दो सीटें जीतती है।
दावा किया गया कि संभल शाही जामा मस्जिद कभी हरिहर मंदिर हुआ करता था इसी के लिए सर्वे का आदेश हुआ था कि ऐसा है या नहीं।एक पक्ष तो कानून के रास्ते पर चल रहा है और कानून के अनुसार दावा कर रहा है तो दूसरे पक्ष को भी कानून के रास्ते पर चलते हुए अदालत में अपना पक्ष रखना चाहिए। अदालत जो फैसला करे उसे मानना चाहिए।
कई लोग गजब का तर्क देते हैं कि मस्जिद के नीचे ही महादेव का मंदिर क्यों होने की बात की जाती है। क्योंकि एक दौर में महादेव के मंदिरों को तोड़कर ही ज्यादातर मस्जिदें बनवाई गई है। पहले कहा जाता था कि ढाई दिन में मस्जिद बन जाती थी तो ढाई दिन में इसी तरह मस्जिद बनाई जाती होगी, मंदिर के गुंबद को तोड़कर वहां मस्जिद की छत बना दी जाए। मंदिर को तोड़कर बहुत सारी मस्जिदें बनाई गई है, इसलिए उनमेें मंदिरों में पाए जाने शुभ चिन्ह कमल,कलश, मूर्तियां,स्तंभ आदि पाए जाते हैं। हिंदू समाज का यकीन किसी दूसरों की जमीन जायदाद पर कब्जा करने में नहीं रहा है, वह अपने आस्था के केंद्र वापस चाहता है वह भी कानूनी तरीके से तो किसी को बुरा नहीं लगना चाहिए। किसी को गलत नहीं लगना चाहिए।






