बीजापुर के दूरस्थ वनांचल में सरकार की संवेदनशील पहल, गंगालूर जैसे रिमोट एरिया में कुपोषण मुक्त अभियान की बड़ी सफलता

Government's sensitive initiative in remote forest areas of Bijapur, huge success of malnutrition free campaign in remote areas like Gangaluur

बीजापुर के दूरस्थ वनांचल में सरकार की संवेदनशील पहल, गंगालूर जैसे रिमोट एरिया में कुपोषण मुक्त अभियान की बड़ी सफलता

महिला एवं बाल विकास विभाग, स्वास्थ्य अमले और आंगनबाड़ी टीम के समन्वित प्रयासों से कुपोषण को मात देकर सामान्य श्रेणी में लौटा ढाई वर्षीय अरुण

रायपुर, 28 मई 2026

 बीजापुर के दूरस्थ वनांचल में सरकार की संवेदनशील पहल, गंगालूर जैसे रिमोट एरिया में कुपोषण मुक्त अभियान की बड़ी सफलता

  मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में प्रदेश सरकार द्वारा संचालित “कुपोषण मुक्त छत्तीसगढ़” के संकल्प को बीजापुर जिले में लगातार जमीन पर उतारा जा रहा है। महिला एवं बाल विकास विभाग, स्वास्थ्य विभाग तथा जिला प्रशासन के समन्वित प्रयासों से अब दूरस्थ अंचलों में भी बच्चों के स्वास्थ्य में सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है। इसी का प्रेरणादायी उदाहरण है बीजापुर जिले के गंगालूर क्षेत्र के आंगनबाड़ी केंद्र कोटिया पारा का ढाई वर्षीय बालक अरुण हेमला, जिसने सतत देखभाल, सही पोषण और सामुदायिक सहयोग से कुपोषण को मात देकर सामान्य श्रेणी में वापसी की है।

              यह कहानी केवल एक बच्चे के स्वस्थ होने की नहीं, बल्कि शासन की योजनाओं, विभागीय प्रतिबद्धता और सामुदायिक सहभागिता की जीवंत मिसाल है। अरुण हेमला, पिता मंगू हेमला एवं माता शर्मीला हेमला का जन्म 21 दिसंबर 2023 को हुआ था। जन्म के समय उसका वजन 2.500 किलोग्राम था। बार-बार बीमार पड़ने तथा घर में पर्याप्त भोजन नहीं कर पाने के कारण उसका वजन लगातार कम बना रहा। अप्रैल 2025 में स्थिति गंभीर होने पर उसे पोषण पुनर्वास केंद्र बीजापुर में भर्ती कराया गया, जहां भर्ती के समय उसका वजन मात्र 8.600 किलोग्राम था, जो उसकी उम्र के अनुसार अत्यंत कम माना गया।

             पोषण पुनर्वास केंद्र से डिस्चार्ज होने के बाद महिला एवं बाल विकास विभाग की टीम ने अरुण के स्वास्थ्य सुधार को मिशन की तरह लिया। पर्यवेक्षक श्रीमती उषा वर्मा के मार्गदर्शन में आंगनबाड़ी कार्यकर्ता श्रीमती मुमीता सोरी, सहायिका श्रीमती सोनिया माज्जी, मितानिन श्रीमती देवली वाचम एवं ए.एन.एम. श्रीमती शोभा किरण मिंज ने लगातार समन्वित प्रयास किए। टीम ने घर-घर जाकर न केवल बच्चे की निगरानी की, बल्कि परिवार को पोषण, स्वच्छता और संतुलित आहार के प्रति जागरूक भी किया।

              निरीक्षण के दौरान टीम ने पाया कि अरुण घर पर अकेले भोजन नहीं करता था, लेकिन आंगनबाड़ी केंद्र में अन्य बच्चों के साथ बैठकर पूरा भोजन कर लेता था। इसके बाद माता-पिता को नियमित रूप से बच्चे को आंगनबाड़ी केंद्र भेजने के लिए प्रेरित किया गया। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता द्वारा हर सप्ताह बच्चे का वजन लिया गया तथा परिवार को भोजन की थाली में अनाज, दाल, सब्जी और फल जैसे चार रंगों को शामिल करने की जानकारी दी गई। केंद्र में प्रतिदिन गर्म पका भोजन एवं रेडी-टू-ईट पोषण आहार उपलब्ध कराया गया। साथ ही मितानिन द्वारा दस्त एवं निमोनिया जैसी बीमारियों से बचाव के उपाय भी बताए गए।

                लगातार 13 महीनों तक चले इन प्रयासों का सकारात्मक परिणाम सामने आया और मई 2026 में अरुण का वजन बढ़कर 10.600 किलोग्राम पहुंच गया। अब वह अपनी उम्र के अनुसार सामान्य श्रेणी में शामिल हो चुका है। उसके चेहरे पर लौटी मुस्कान और आंखों की चमक इस बात का प्रमाण है कि सही समय पर सही देखभाल से कुपोषण जैसी समस्या पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता है।

               अरुण की मां शर्मीला हेमला बताती हैं कि पहले उन्हें अपने बेटे की हालत देखकर हमेशा डर लगा रहता था, लेकिन आंगनबाड़ी और स्वास्थ्य विभाग की टीम ने लगातार घर पहुंचकर समझाइश दी और बच्चे की देखभाल में सहयोग किया। अब अरुण स्वयं भोजन मांगकर खाता है और पहले से कहीं अधिक सक्रिय एवं स्वस्थ है।

               पर्यवेक्षक श्रीमती उषा वर्मा ने कहा कि अरुण की सफलता यह साबित करती है कि यदि आंगनबाड़ी, स्वास्थ्य विभाग और मितानिन मिलकर कार्य करें तथा परिवार का सहयोग मिले, तो हर बच्चे को कुपोषण से बाहर निकाला जा सकता है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार द्वारा संचालित पोषण अभियान और कुपोषण मुक्त छत्तीसगढ़ अभियान के तहत जिले में लगातार प्रभावी कार्य किए जा रहे हैं, जिनका सकारात्मक परिणाम अब सामने आने लगा है।

               बीजापुर जिला प्रशासन और महिला एवं बाल विकास विभाग की यह सफलता दर्शाती है कि शासन की योजनाएं जब संवेदनशीलता और समर्पण के साथ धरातल पर लागू होती हैं, तब दूरस्थ क्षेत्रों के बच्चों का भविष्य भी सुरक्षित और स्वस्थ बनाया जा सकता है। अरुण हेमला की कहानी आज अन्य परिवारों के लिए भी प्रेरणा बन रही है कि सतत निगरानी, संतुलित पोषण और सामुदायिक सहभागिता से स्वस्थ बचपन का सपना साकार किया जा सकता है।