कृषि विज्ञान केंद्र में उर्वरकों की वैकल्पिक व्यवस्था पर प्रशिक्षण
Training on alternative fertilizer arrangements at Krishi Vigyan Kendra
अक्षय तृतीया पर व्यापक जागरूकता शिविर का आयोजन
गरियाबंद, 21 अप्रैल 2026 इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर एवं अटारी जबलपुर के निर्देशानुसार कृषि विज्ञान केंद्र, गरियाबंद द्वारा अक्षय तृतीया (अक्ती तिहार) के पावन अवसर पर कृषक प्रशिक्षण एवं जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर जिला पंचायत की उपाध्यक्ष श्रीमती लालिमा ठाकुर, श्री गंगूराम साहू सहित जनप्रतिनिधि, कृषि विभाग के अधिकारी, वैज्ञानिकगण एवं बड़ी संख्या में किसान उपस्थित रहे।
कार्यक्रम का शुभारंभ पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ पूजा-अर्चना कर किया गया। संस्था प्रमुख डॉ. मनीष चौरसिया ने बताया कि जिले में संतुलित उर्वरक उपयोग को बढ़ावा देने और किसानों को टिकाऊ एवं लाभकारी खेती की ओर प्रेरित करने के लिए इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रम निरंतर आयोजित किए जाएंगे। उन्होंने कहा कि बदलते कृषि परिदृश्य में वैज्ञानिक पद्धतियों को अपनाना समय की आवश्यकता है।
मृदा वैज्ञानिक श्री मनीष आर्या ने किसानों को उर्वरकों के संतुलित एवं वैज्ञानिक उपयोग की विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि जिले में रासायनिक उर्वरकों, विशेषकर डीएपी के अत्यधिक उपयोग से मृदा में पोषक तत्वों का असंतुलन बढ़ रहा है, जिससे दीर्घकाल में उत्पादन प्रभावित हो सकता है। उन्होंने किसानों को वैकल्पिक उर्वरकों के उपयोग और एकीकृत पोषण प्रबंधन अपनाने की सलाह दी। प्रशिक्षण के दौरान नैनो यूरिया, नैनो डीएपी, सिंगल सुपर फॉस्फेट, एनपीके कॉम्प्लेक्स उर्वरक, म्यूरेट ऑफ पोटाश तथा जैव उर्वरकों जैसे राइजोबियम, पीएसबी, एजोटोबैक्टर और एजोस्पिरिलम के उपयोग की जानकारी दी गई। साथ ही हरी खाद, केंचुआ खाद एवं नील हरित शैवाल के उपयोग को भी बढ़ावा देने पर जोर दिया गया। किसानों को सलाह दी गई कि वे हर 2-3 वर्ष में मृदा परीक्षण कराएं, मृदा स्वास्थ्य कार्ड के आधार पर उर्वरकों का उपयोग करें तथा जिंक एवं सल्फर जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों का आवश्यकता अनुसार प्रयोग करें।
विशेषज्ञों ने बताया कि नैनो उर्वरकों का उपयोग कम मात्रा में अधिक प्रभावी होता है, जिससे उर्वरक उपयोग दक्षता बढ़ती है और पर्यावरणीय प्रदूषण में कमी आती है। जैव उर्वरकों के उपयोग से मृदा में सूक्ष्मजीवों की सक्रियता बढ़ती है, जिससे मृदा की संरचना और दीर्घकालीन उर्वरता में सुधार होता है। कार्यक्रम में किसानों ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि वैकल्पिक उर्वरकों के उपयोग से उत्पादन लागत में कमी आई है और फसल की गुणवत्ता में सुधार हुआ है। किसानों ने ऐसे कार्यक्रमों को उपयोगी बताते हुए कृषि विज्ञान केंद्र से निरंतर तकनीकी मार्गदर्शन की अपेक्षा व्यक्त की। कार्यक्रम में कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकगण, कृषि विभाग के अधिकारी, ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी, प्रगतिशील किसान एवं बड़ी संख्या में महिला कृषक उपस्थित रहे।






